माँ-पिता बताते हैं कि गोरखपुर में पैदा हुआ था लेकिन पिता का ट्रांसफ़र बनारस हो गया। ठीक से बनारसी हो पाता कि गणित से ग्रेजुएट होने के बाद दिल्ली जाना पड़ा। नेटवर्क इंजीनियरिंग छोड़कर दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई की। दिल्ली में दोस्त बने, कहानियाँ छपने लगीं तो दिल्ली छूट गई। पत्रकारिता की नौकरी करने इलाहाबाद जाना पड़ा। इलाहाबाद में मन लगने लगा तो लखनऊ ट्रांसफ़र हुआ और इलाहाबाद छूट गया। फ़िल्म बनाने का कीड़ा मुंबई ले आया तो कई सारी ग़लतफ़हमियाँ छूटीं। इस जद्दोजहद में कई अच्छी आदतें छूटीं और अपने अंदाज़ से जीने की कोशिश में कई दोस्त छूटे।
इस थामने छूटने के बीच ‘डर’, ‘मस्तूलों के इर्दगिर्द’, ‘मैं और मेरी कहानियाँ’, ‘उत्तर प्रदेश की खिड़की’, और ‘मारण मंत्र’ नाम से कहानियों की किताबें आईं और ‘ई इलहाब्बाद है भइया’ संस्मरण। फिल्मों पर आलेख संग्रह ‘सिनेमा की दुनिया और दुनिया का सिनेमा’। पहले उपन्यास ‘भले दिनों की बात थी’ के बाद दूसरा उपन्यास ‘लहरतारा’। लहरतारा का दूसरा और आखिरी हिस्सा ‘दसासमेध’
अब इच्छा यही है इतने छूटने के बीच कभी अपने प्रियजनों का साथ न छूटे। इन प्रियजनों में घर, परिवार और दोस्तों के साथ मेरे पाठक भी शामिल हैं जिन्होंने मेरे लिखे पर मेरे विश्वास को तब तब बढ़ाया है जब जब मुझसे लिखना छूटने लगा था।