केशव तिवारी का जन्म उन दिनों का है, जब आवारा पूँजी ने अपना ‘अ’ लिखा था और क़स्बों ने नगर और नगरों ने महानगर होना शुरू कर दिया था। गाँव इस चाल की भयावह चपेट में थे। उनका यथार्थ लोक का जाल रचने वाले कवियों की समझ से बाहर चला गया था। इस समकालीनता में अपने सरोकार और संघर्ष की वजह से केशव सरीखे कवियों की लड़ाई दुतरफ़ा हो गई।
उनके लिए कविता उतनी आसान नहीं थी जितनी केदारनाथ सिंह के रास्ते पर चलने से नवें दशक के तमाम कवियों की हो गई। केशव ने यह रास्ता कभी नहीं लिया, क्योंकि यह रास्ता लेते ही आप सबसे पहले ‘घर का रास्ता’ भूल जाते हैं।
केशव के अब तक तीन कविता-संग्रह— ‘इस मिट्टी से बना’, ‘आसान नहीं विदा कहना’, ‘तो काहे का मैं’ प्रकाशित हो चुके हैं। ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ एक दशक बाद प्रकाशित उनका चौथा और नवीनतम कविता-संग्रह है।