अमृतेश मूलतः नालंदा से हैं और पेशे से भारत सरकार के केंद्रीय श्रम सेवा के अधिकारी हैं। इन्होंने अपनी लेखकीय यात्रा का आग़ाज़ 2019 में कहानी ‘दादू भी मॉल जाएँगे?’ से किया और जिसके लिए इन्हें अमेज़ॉन किंडल का प्रतिष्ठित ‘पेन-टू-पब्लिश’ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
साल 2020 में हिन्द युग्म से प्रकाशित अपने पहले उपन्यास ‘साइकिल की चेन’ से इन्होंने अपने लिए एक अलग पाठक वर्ग तैयार किया है। ग़ौरतलब है कि इस उपन्यास को Mumbai Film Festival के ‘Word to Screen 2024’ में भी चयनित किया गया है। श्रीजा प्रकाशन के द्वारा हाल ही में प्रकाशित इनका पहला कहानी-संग्रह ‘पेपर-बोट’ को भी अपने दूसरे संस्करण के साथ, पाठकों की ख़ूब सराहना मिल रही है।